Maharani 4 Review; Huma Qureshi Brings Bihar Politics: महारानी 4 रिव्यू; हूमा कुरैशी बिहार की राजनीति को नई दिल्ली लाती हैं!

Rajeev
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महारानी 4 रिव्यू: हूमा कुरैशी बिहार की राजनीति को नई दिल्ली लाती हैं, राष्ट्र की मनोदशा को प्रतिबिंबित करती हुईं, 

रिव्यू: स्केल बड़ा है, दांव ऊंचा है, कास्ट विशाल है, लेकिन सीजन लंबा लगता है

नमस्कार दोस्तों! ओटीटी की दुनिया में राजनीतिक ड्रामा का एक नया अध्याय खुल चुका है – महारानी का चौथा सीजन। सोनी लिव पर रिलीज हुए इस सीजन ने एक बार फिर हूमा कुरैशी को रानी भारती के किरदार में वापस ला दिया है, जो अब सिर्फ बिहार की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गईं। बल्कि, दिल्ली की सत्ता की कुर्सी तक अपनी नजरें गड़ाए हुए हैं। कल ही बिहार में 2025 विधानसभा चुनाव का पहला चरण संपन्न हुआ, जहां वोटर टर्नआउट 64.66% रहा – और ठीक उसी वक्त महारानी 4 का आगमन हुआ है। क्या बेहतर टाइमिंग हो सकती थी? यह सीजन न सिर्फ बिहार की राजनीति को राष्ट्रीय पटल पर लाता है, बल्कि देश की मौजूदा राजनीतिक उथल-पुथल को आईने की तरह दिखाता है। आइए, इसकी गहराई में उतरते हैं।

कहानी का सार: बिहार से दिल्ली तक का सफर

महारानी 4 पिछले सीजन से सीधा जुड़ता है, लेकिन एक टाइम जंप के साथ – 2000 के दशक से वर्तमान समय तक। रानी भारती (हूमा कुरैशी) अब बिहार की मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अपने पति भीमा भारती (सोहम शाह) के हत्यारों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया है। लेकिन शत्रु कभी खत्म नहीं होते। जेल से ही साजिशें रचने वाले नाविन कुमार (अमित सियाल) जैसे पुराने दुश्मन तो हैं ही, अब नए चेहरे उभरते हैं। रानी की महत्वाकांक्षा बढ़ती जाती है, जो उनकी लंबे समय से साथ देने वाली सेक्रेटरी कावेरी (कनी कुसरुति) को पसंद नहीं आती।

इस सीजन की खासियत यह है कि कहानी बिहार से बाहर निकलकर पूरे देश का दौरा करती है – दिल्ली, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर। प्रधानमंत्री जोशी (विपिन शर्मा) जैसे शक्तिशाली किरदार का प्रवेश होता है, जो रानी को गठबंधन का लालच देते हैं। लेकिन रानी का जवाब? "सिंहासन खींच लेंगे आपका!" यह डायलॉग ही सीजन की धड़कन है। रानी दिल्ली की कुर्सी पर नजर रखती हैं, लेकिन घर और पार्टी में फूट पड़ रही है। पुरानी पीढ़ी (मिश्रा जी – प्रमोद पाठक) बनाम नई (उनके बच्चे) – यह पारिवारिक और राजनीतिक संघर्ष सीजन को नई ऊंचाई देता है। बिना स्पॉइलर दिए कहूं तो, यह सीजन रानी की कमजोरियों को उजागर करता है – महत्वाकांक्षा बनाम वफादारी, सार्वजनिक छवि बनाम निजी जीवन।

कास्ट और परफॉर्मेंस: हूमा की वापसी, नई पीढ़ी का धमाका

हूमा कुरैशी इस सीजन में चरम पर हैं। रानी भारती का किरदार अब सिर्फ एक विधवा नहीं, बल्कि एक सशक्त, महत्वाकांक्षी नेता है, जो बिहारी उच्चारण और रणनीतिक चुप्पी के साथ जीवंत हो उठती है। उनकी आंखों में आग है, लेकिन दिल में संशय भी। विपिन शर्मा का पीएम जोशी एक चालाक, औरंगजेब जैसा खलनायक है – न चिल्लाता है, न ओवरएक्टिंग, लेकिन हर सीन में डर पैदा करता है।

नई कास्ट में सबसे चमकते सितारे हैं रानी के बच्चे। श्वेता बसु प्रसाद रोशनी भारती के रूप में परिपक्व और संयमित हैं – एक ऐसी बेटी जो मां की तरह पंजे दिखाती है। शार्दुल भारद्वाज जय प्रकाश भारती के रूप में फेनोमिनल हैं – महत्वाकांक्षी बेटा, जो गंजे की लत में भी कनेक्शंस बनाए रखता है। दर्शील सफरी सूर्या के रूप में एक गेस्ट अपीयरेंस देते हैं, जो राजनीति से दूर रहना चाहता है। कनी कुसरुति की कावेरी इस सीजन की सरप्राइज पैकेज है – वफादारी और असंतोष का मिश्रण। अमित सियाल और विनीत कुमार जैसे पुराने चेहरे भी मजबूती देते हैं। कुल मिलाकर, परफॉर्मेंस इतनी तेज हैं कि राजनीतिक चालबाजी के साथ पारिवारिक रिश्तों की जटिलता भी उभर आती है।

मजबूतियां: बड़ा कैनवास, गहरा कमेंट्री

महारानी 4 का स्केल अभूतपूर्व है। बिहार से दिल्ली तक का सफर, गठबंधन की राजनीति, "डबल इंजन" सरकार का जिक्र – यह सब देश की वर्तमान मनोदशा को प्रतिबिंबित करता है। "नो हिंदी, नो पीएम" जैसे डायलॉग भाषा बहस को छूते हैं, जबकि "जुमला", "परिवारवाद" जैसे शब्द राजनीतिक विमर्श को तीखा बनाते हैं। नई पीढ़ी का प्रवेश ताजगी लाता है, और भावनात्मक दांव ऊंचे होते हैं। निर्देशक पूनीत प्रकाश और क्रिएटर सुभाष कपूर ने बिहार की कच्ची राजनीति को राष्ट्रीय मंच पर ले जाकर "देसी गेम ऑफ थ्रोन्स" जैसा अनुभव दिया है। प्रोडक्शन वैल्यू – रैलियां, ऑफिस की साजिशें, लंबी रातें – सब कुछ प्रामाणिक लगता है। यह सीजन भावनात्मक गहराई और ग्राउंडेड स्टोरीटेलिंग के लिए सराहनीय है।

कमजोरियां: लंबा और भटकाव भरा

हालांकि स्केल बड़ा है, दांव ऊंचे हैं, कास्ट विशाल है, लेकिन सीजन लंबा लगता है। 8 एपिसोड (प्रत्येक 40 मिनट) में बहुत कुछ पैक है, जिससे पेसिंग रश्ड हो जाती है। कुछ संवाद या ट्विस्ट इतनी तेजी से आते हैं कि बिल्ड-अप की कमी महसूस होती है। सबप्लॉट्स ओवरक्राउडेड हैं – राजनीति-व्यवसाय का नेक्सस या पारिवारिक ट्विस्ट प्रेडिक्टेबल लगते हैं। रानी की हार तय लगती है शुरुआत से ही, जो थोड़ा निराश करता है। फिर भी, यह सब अगले सीजन के लिए एक क्रूर बदला की नींव रखता है, जो उत्साहित करता है।

निष्कर्ष: देखने लायक, लेकिन धैर्य चाहिए

महारानी 4 एक ऐसा राजनीतिक चेस है, जहां व्यक्तिगत राजनीतिक हो जाता है, और राजनीतिक व्यक्तिगत। हूमा कुरैशी की वापसी इसे अनिवार्य बना देती है। अगर आप इंट्रिग, महत्वाकांक्षा और भावनात्मक दांव पसंद करते हैं, तो यह आपके लिए है। रेटिंग: 3.5/5। बिहार चुनाव के बीच में, यह सीजन राष्ट्र की नब्ज पकड़ता है – देखिए और महसूस कीजिए।

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