नई दिल्ली, भारत – बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मौत की सजा सुनाए जाने की खबर ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। ढाका के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई है। यह सजा 2024 में छात्र आंदोलन के दौरान हुई क्रूर कार्रवाई से जुड़ी है, जिसमें लगभग 1,400 लोग मारे गए थे। लेकिन, हसीना अभी भी भारत में सुरक्षित शरण में हैं, और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत उन्हें बांग्लादेश सौंपने की संभावना नहीं रखता।
इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि शेख हसीना मौत की सजा और भारत-बांग्लादेश संबंध के बीच उलझन क्यों बढ़ रही है। क्या यह राजनीतिक बदले की भावना है या भू-राजनीतिक रणनीति? आइए, इस मुद्दे की गहराई में उतरें।
शेख हसीना का पतन: 2024 का छात्र आंदोलन और निर्वासन
शेख हसीना, बांग्लादेश की सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाली प्रधानमंत्री, का राजनीतिक सफर 1996 से शुरू हुआ था। वह शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं, जिन्होंने 1971 के बांग्लादेश-पाकिस्तान युद्ध में नेतृत्व किया था। 2009 से 2024 तक हसीना की सरकार ने आर्थिक विकास पर जोर दिया। पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर द्वारा "बास्केट केस" कहे जाने वाले बांग्लादेश ने जीडीपी वृद्धि में भारत को पीछे छोड़ दिया। प्रति व्यक्ति आय में भी सुधार हुआ।
लेकिन, यह चमक सब कुछ नहीं थी। हसीना की सरकार पर दमनकारी होने के आरोप लगे। विपक्षी दलों को चुनावों से बहिष्कृत किया गया, हजारों लोग जबरन गायब किए गए, अतिरिक्त-न्यायिक हत्याएं हुईं, और यातनाओं के मामले आम हो गए। जुलाई 2024 में, सरकारी नौकरियों में 1971 के स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए कोटा के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन तेजी से हसीना-विरोधी आंदोलन में बदल गया।
सुरक्षा बलों की क्रूर कार्रवाई में सैकड़ों छात्र मारे गए। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, कुल 1,400 से अधिक मौतें हुईं। आखिरकार, 5 अगस्त 2024 को हसीना ने इस्तीफा दिया और भारत भाग आईं। नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने अंतरिम सरकार का नेतृत्व संभाला।
ढाका की 24 वर्षीय छात्रा शीमा आख्तर जैसी युवतियां आज भी इस सजा को न्याय मानती हैं। "फासीवादी हसीना को लगा था कि वह कभी हार नहीं सकती," आख्तर कहती हैं। लेकिन, सजा का मतलब फांसी नहीं है – कम से कम अभी तो नहीं। हसीना नई दिल्ली में सुरक्षित हैं, और बांग्लादेश की बार-बार की मांगों के बावजूद भारत उन्हें सौंपने को तैयार नहीं।
बांग्लादेश में उत्सव, लेकिन भारत में चुप्पी: क्यों नहीं लौटेगी हसीना?
बांग्लादेश में हसीना की मौत की सजा पर प्रदर्शनकारियों ने तालियां बजाईं। ढाका विश्वविद्यालय की छात्राएं इसे "शहीदों के लिए न्याय" कह रही हैं। लेकिन, वास्तविकता यह है कि हसीना गॉलो से कोसों दूर हैं। बांग्लादेश ने भारत से प्रत्यर्पण संधि का हवाला देकर हसीना की वापसी की मांग की है। ढाका के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत का शरण देना "न्याय की अवहेलना" और "अनैतिक कृत्य" होगा।
फिर भी, भारत प्रत्यर्पण नहीं करेगा। क्यों? आइए, मुख्य कारणों पर नजर डालें:
1. प्रत्यर्पण संधि में राजनीतिक अपवाद
भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि अपराध "राजनीतिक स्वभाव का" हो, तो प्रत्यर्पण नहीं किया जाएगा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संजय भारद्वाज कहते हैं, "भारत इसे बांग्लादेश की सत्ताधारी ताकतों की राजनीतिक प्रतिशोध मानता है।" यूनुस सरकार को भारत "भारत-विरोधी ताकतों" के रूप में देखता है। हसीना को सौंपना मतलब इन ताकतों को वैधता देना होगा।
2. हसीना का भारत से गहरा नाता
हसीना भारत की लंबे समय की सहयोगी रहीं। उनकी सरकार के दौरान आर्थिक, सुरक्षा और राजनीतिक संबंध मजबूत हुए। भारत ने हसीना को 1975 में उनके पिता की हत्या के बाद शरण दी थी। आज, हसीना भारत में रह रही हैं, और नई दिल्ली उन्हें "परिवार" की तरह देखता है। पूर्व भारतीय हाई कमिश्नर पिनाक रंजन चक्रवर्ती कहते हैं, "नई दिल्ली कैसे उसे मौत की ओर धकेल सकता है? यह अत्यंत अनैतिक होगा।"
3. वर्तमान तनाव: यूनुस सरकार का पाकिस्तान झुकाव
यूनुस सरकार ने पाकिस्तान के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश की है, जो भारत के लिए चिंता का विषय है। प्रदर्शनकारी नेता भारत को हसीना का समर्थक मानते हैं। यह सब भारत बांग्लादेश तनाव को बढ़ा रहा है। भारत का विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह "निर्णय को नोटिस किया है" और बांग्लादेश के लोगों के हित में काम करेगा, लेकिन प्रत्यर्पण पर चुप्पी साधे हुए है।
भारत-बांग्लादेश संबंध: हसीना युग से यूनुस युग तक का सफर
हसीना के शासन में संबंध स्वर्णिम थे। व्यापार, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर सहयोग बढ़ा। लेकिन, अब सब बदल गया। यूनुस के नेतृत्व में संबंधों में अविश्वास है। चक्रवर्ती कहते हैं, "यह सरकार के तहत संबंध तनावपूर्ण रहेंगे, क्योंकि वे लगातार हसीना की मांग करेंगे।"
जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर श्रीराधा दत्ता कहती हैं, "भारत हसीना के बिना फंस गया है।" आदर्श रूप से, भारत चाहेगा कि अवामी लीग सत्ता में लौटे, क्योंकि हसीना "भारत के लिए सबसे अच्छा दांव" हैं। लेकिन, वास्तविकता अलग है। बांग्लादेश में हसीना के खिलाफ जन-रोष इतना है कि उनकी वापसी असंभव लगती है।
दत्ता आगे कहती हैं, "भारत को अन्य राजनीतिक ताकतों से संबंध बनाना होगा। वर्तमान में द्विपक्षीय संबंध नाजुक हैं, लेकिन हसीना प्रत्यर्पण के एजेंडे से आगे बढ़ना होगा।"
फरवरी 2026 चुनाव: नया मोड़?
बांग्लादेश में फरवरी 2026 के चुनाव एक नया अवसर ला सकते हैं। अवामी लीग प्रतिबंधित है, और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) जैसी विपक्षी ताकतें भारत-विरोधी हैं। फिर भी, चक्रवर्ती कहते हैं, "चुनित सरकार के साथ काम करना आसान होगा। भारत को इंतजार करना चाहिए, लेकिन व्यापार जैसे क्षेत्रों में सद्भाव बनाए रखना चाहिए।"
निष्कर्ष: न्याय बनाम कूटनीति – भारत का दुविधाग्रस्त रुख
शेख हसीना प्रत्यर्पण का मुद्दा भारत और बांग्लादेश के बीच एक कांटा बन गया है। बांग्लादेश में युवा पीढ़ी न्याय की मांग कर रही है, लेकिन भारत इसे राजनीतिक प्रतिशोध मानता है। प्रत्यर्पण संधि का अपवाद, हसीना का ऐतिहासिक नाता और वर्तमान भू-राजनीतिक तनाव – ये सब मिलकर भारत को रोक रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि नई दिल्ली हसीना को सौंपकर अपनी साख खराब नहीं करेगी। इसके बजाय, वह बांग्लादेश के साथ नए समीकरण बनाने पर जोर देगी। क्या फरवरी चुनाव संबंधों को सुधारेंगे? समय बताएगा। लेकिन, फिलहाल भारत शेख हसीना को मौत (death penalty for former PM Sheikh Hasina) की सजा का सामना करने नहीं भेजेगा। यह कदम न केवल कूटनीतिक होगा, बल्कि भारत की क्षेत्रीय रणनीति का हिस्सा भी।
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