30 साल पुराना किस्सा: दिग्विजय सिंह ने शेयर की मोदी-आडवाणी की 1995 वाली तस्वीर, RSS-BJP की तारीफ से मचा सियासी बवाल – जानें पूरी अनसुनी कहानी!
दिग्विजय सिंह ने शेयर की मोदी आडवाणी 1995 तस्वीर, RSS BJP संगठन की तारीफ से कांग्रेस में हंगामा। गुजरात चुनाव 1995 की कहानी, केशुभाई पटेल शपथग्रहण, मोदी का उदय। दिग्विजय सिंह पोस्ट विवाद, यू-टर्न और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं।
नमस्कार, राजनीति प्रेमियों! अगर आप भारतीय सियासत के उतार-चढ़ावों के दीवाने हैं, तो आज की यह पोस्ट आपके लिए किसी थ्रिलर से कम नहीं। कल, 27 दिसंबर 2025 को कांग्रेस वर्किंग कमिटी (CWC) की बैठक से ठीक पहले, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक ऐसी तस्वीर शेयर की, जिसने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को हिला दिया। यह तस्वीर कोई साधारण फोटो नहीं, बल्कि 30 साल पुरानी मोदी-आडवाणी तस्वीर है – जिसमें युवा नरेंद्र मोदी फर्श पर बैठे दिख रहे हैं, जबकि लालकृष्ण आडवाणी मंच पर विराजमान हैं। दिग्विजय ने इसे शेयर करते हुए RSS और BJP के संगठन की ताकत की खुलकर तारीफ की, जिससे सोशल मीडिया पर भूचाल आ गया। क्या यह कांग्रेस नेतृत्व पर तंज था? या संगठन निर्माण का सबक? इस दिग्विजय सिंह पोस्ट विवाद की पूरी परतें खोलते हैं हम – ऐतिहासिक संदर्भ से लेकर आज की प्रतिक्रियाओं तक। अंत तक पढ़ें, क्योंकि हम बताएंगे कि कैसे एक फोटो ने 2025 की सियासत को नया मोड़ दे दिया! चलिए, इस 30 साल पुराने किस्से की गहराई में उतरते हैं।
📸 दिग्विजय सिंह की वायरल पोस्ट: RSS-BJP की तारीफ, लेकिन क्यों मचा बवाल?
27 दिसंबर 2025, सुबह के समय X (पूर्व ट्विटर) पर दिग्विजय सिंह (@digvijaya_28) ने एक पोस्ट की, जो चंद घंटों में लाखों व्यूज पार कर गई। पोस्ट में मोदी आडवाणी पुरानी फोटो शेयर करते हुए उन्होंने लिखा: "RSS का एक जमीनी स्वयंसेवक और बीजेपी का साधारण कार्यकर्ता नीचे बैठकर मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री बना। यह संगठन की शक्ति है।" उन्होंने कई कांग्रेस नेताओं को टैग भी किया, जैसे राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे आदि। यह पोस्ट CWC बैठक से ठीक पहले आई, जहां पार्टी संगठन को मजबूत करने पर फोकस था – प्रियंका गांधी की नियुक्ति और राज्य स्तर पर बदलावों पर चर्चा हो रही थी।
पोस्ट के मुख्य पॉइंट्स:
- तारीफ का फोकस: दिग्विजय ने RSS-BJP की अनुशासन संस्कृति को सराहा, जहां वरिष्ठों के सम्मान में फर्श पर बैठना सामान्य है। उन्होंने इसे जमीनी कार्यकर्ता से शीर्ष तक पहुंच का प्रतीक बताया।
- विवाद का बीज: कईयों ने इसे राहुल गांधी पर अप्रत्यक्ष हमला माना – जैसे कह रहे हों कि कांग्रेस में परिवारवाद हावी है, जबकि BJP में मेरिट। BJP ने इसे कांग्रेस के आंतरिक असंतोष का सबूत बताया।
- वायरल इफेक्ट: पोस्ट को 50,000+ लाइक्स, हजारों रीपोस्ट मिले। हैशटैग #DigvijayaSinghPost और #RSSPower ट्रेंड करने लगे।
यह पोस्ट क्यों इतनी हलचल मचाई? क्योंकि दिग्विजय सिंह, जो RSS-BJP की आलोचना के लिए मशहूर हैं, ने अचानक उनकी तारीफ की। क्या यह रणनीतिक था, या व्यक्तिगत? आइए, तस्वीर की असली कहानी जानें।(NDTV पर पूरी खबर)
🏛️ 1995 की वो ऐतिहासिक तस्वीर: केशुभाई पटेल के शपथग्रहण का सुनहरा पल
अब सवाल: यह मोदी आडवाणी 1995 तस्वीर आखिर है कहां की? यह कोई स्टेज्ड फोटो नहीं, बल्कि 14 मार्च 1995 को गांधीनगर, गुजरात में खींची गई। संदर्भ? केशुभाई पटेल का पहला मुख्यमंत्री शपथग्रहण समारोह। उस दिन गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों ने इतिहास रच दिया था – BJP ने 121 सीटें जीतकर कांग्रेस की चिमनभाई पटेल सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। गुजरात में पहली बार भाजपा बहुमत की सरकार बनी, जो RSS-BJP की संगठनात्मक ताकत का प्रतीक बनी।
तस्वीर का विस्तृत विवरण:
- मुख्य किरदार: मंच पर लालकृष्ण आडवाणी कुर्सी पर बैठे हैं – तत्कालीन BJP अध्यक्ष। उनकी बाईं ओर पत्नी कमला आडवाणी, दाईं ओर BJP नेता छबीलदास मेहता। पीछे प्रमोद महाजन खड़े हैं, और पास ही आनंदीबेन पटेल नजर आ रही हैं।
- मोदी की भूमिका: फर्श पर आडवाणी के ठीक पास युवा नरेंद्र मोदी बैठे हैं – सफेद कुर्ता-पायजामा में, सादगी भरा लुक। तब वे गुजरात BJP के संगठन महामंत्री थे, RSS शाखा से निकलकर 1987 से सक्रिय। चुनावी रणनीति के सूत्रधार माने जाते थे।
- माहौल: विशाल पंडाल में भारी भीड़, जोशीले नारे – "भारत माता की जय" गूंज रहे थे। केशुभाई पटेल, RSS प्रचारक और छह बार विधायक, शपथ ले रहे थे।
यह तस्वीर BJP-RSS की अनुशासन संस्कृति का आईकॉन बनी – जहां वरिष्ठों का सम्मान सर्वोपरि। दिग्विजय की पोस्ट में इसे हाइलाइट किया गया, लेकिन कई ने इसे हिंदुत्व लहर का प्रतीक भी बताया।
क्यों खास था यह दिन? 1990 के दशक में BJP गुजरात में उभर रही थी। आडवाणी की रथ यात्रा (1990) ने हिंदुत्व को जन्म दिया, और मोदी ने इसे जमीनी स्तर पर फैलाया। 1995 की जीत ने BJP को दक्षिण की ओर विस्तार का रास्ता खोला।
🗳️ गुजरात 1995 चुनाव: BJP की पहली बड़ी जीत, कांग्रेस का झटका
1995 के गुजरात विधानसभा चुनाव BJP के लिए मील का पत्थर साबित हुए। कुल 182 सीटों में BJP को 121, कांग्रेस को 45 मिलीं। चिमनभाई पटेल की सरकार गिर गई, जो 1990 में BJP समर्थन से बनी थी लेकिन बाद में अलग हो गई।
चुनाव के की हाइलाइट्स (टेबल फॉर्मेट में):
| पैरामीटर | BJP का प्रदर्शन | कांग्रेस का प्रदर्शन | प्रभाव |
|---|---|---|---|
| सीटें जीती | 121 | 45 | BJP पहली बहुमत सरकार |
| वोट शेयर | 43.8% | 32.5% | हिंदुत्व लहर का असर |
| की लीडरशिप | केशुभाई पटेल (CM), मोदी (ऑर्गनाइजर) | चिमनभाई पटेल (पूर्व CM) | संगठन vs परिवारवाद |
| मुख्य मुद्दे | राम मंदिर, विकास | भ्रष्टाचार आरोप | BJP की जमीनी पहुंच |
यह जीत RSS की शाखा नेटवर्क का कमाल थी – 100+ सीटों का श्रेय मोदी को मिला। लेकिन स्थिरता कम रही: 1996 में शंकर सिंह वाघेला के विद्रोह से केशुभाई की कुर्सी गई। 1998 में लौटे, लेकिन 2001 के भुज भूकंप के बाद मोदी CM बने। यह चुनाव दर्शाता है कि संगठन की ताकत कैसे लंबे समय तक फलती-फूलती है।
दिग्विजय की पोस्ट ने इस इतिहास को 2025 में जीवंत कर दिया – क्या कांग्रेस को इससे सबक लेना चाहिए?
🚀 नरेंद्र मोदी का सफर: फर्श से शिखर तक, RSS की देन?
तस्वीर में फर्श पर बैठे युवा मोदी आज दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेताओं में शुमार हैं। उनका सफर RSS शाखा से शुरू हुआ – 1970 के दशक में स्वयंसेवक बने, 1980 के दशक में BJP जॉइन। 1987 से गुजरात प्रांत RSS प्रचारक, फिर 1990 में आडवाणी रथ यात्रा के गुजरात कोऑर्डिनेटर।
मोदी के उदय के स्टेप्स (नंबर लिस्ट):
- 1987-1995: गुजरात BJP ऑर्गनाइजर – चुनावी स्ट्रैटेजी बनाई, 1995 जीत का आर्किटेक्ट।
- 1995-2001: केशुभाई सरकार में मंत्री, फिर CM – भूकंप प्रबंधन से स्टार बने।
- 2001-2014: गुजरात CM – "वाइब्रेंट गुजरात" मॉडल से राष्ट्रीय छवि।
- 2014-आज: PM – 2014, 2019, 2024 जीतें, RSS-BJP संगठन की बदौलत।
दिग्विजय ने इसे संगठन की शक्ति कहा, जो BJP के लिए प्रचार पॉइंट है। लेकिन आलोचक कहते हैं, यह अनुशासन नहीं, बल्कि हिंदुत्व पॉलिटिक्स का नतीजा। 2025 में, जब BJP 300+ सीटें जीत चुकी, यह तस्वीर पुरानी यादें ताजा करती है।
⚔️ सियासी प्रतिक्रियाएं: कांग्रेस में यू-टर्न, BJP का तंज
पोस्ट वायरल होते ही राजनीतिक बवाल मच गया। BJP ने इसे कांग्रेस की हार का इकबाल बताया – प्रवक्ता ने कहा, "दिग्गी राजा ने खुद स्वीकारा कि राहुल की तानाशाही से पार्टी बर्बाद हो रही।"
कांग्रेस की तरफ से:
- पवन खेड़ा: "गोडसे वाली संगठन से क्या सीखें? गांधी की पार्टी को हत्यारों से कुछ नहीं चाहिए।"
- सुप्रिया श्रीनेट: "RSS को कांग्रेस से सीखना चाहिए – हमने आजादी की लड़ाई लड़ी।"
- अलका लांबा: "संघ ब्रिटिश समर्थक था, अब सांप्रदायिक।"
- शशि थरूर: समर्थन में – "संगठन मजबूत होना चाहिए, अनुशासन जरूरी।"
28 दिसंबर को दिग्विजय ने यू-टर्न लिया: पत्रकारों से कहा, "गोडसे जैसे हत्यारों के समर्थकों से कुछ सीखने लायक नहीं। मैं 50 साल से सांप्रदायिक ताकतों से लड़ रहा हूं। RSS विचारधारा का विरोध जारी रहेगा।" लेकिन उन्होंने माना, हर संगठन को मजबूत बनाना चाहिए। यह सफाई विवाद थामने की कोशिश लगी, लेकिन सोशल मीडिया पर मीम्स और डिबेट्स जारी हैं।
BJP की प्रतिक्रिया: "कांग्रेस जल रही है – दिग्विजय ने सच्चाई उगल दी।" अमित मालवीय ने ट्वीट किया, "RSS की ताकत से ही मोदी PM बने, परिवारवाद से नहीं।"
यह विवाद कांग्रेस संगठन बहस 2025 को हवा दे रहा – क्या CWC में बदलाव होंगे?
🤔 निष्कर्ष: एक तस्वीर, अनगिनत सबक – सियासत में संगठन ही राजा?
दिग्विजय सिंह तस्वीर विवाद से साफ है कि भारतीय राजनीति में संगठन की ताकत अमिट है। 1995 की यह फोटो न सिर्फ मोदी के सफर की याद दिलाती है, बल्कि RSS-BJP की जड़ों को मजबूत करती है। दिग्विजय का यू-टर्न दर्शाता है कि पोस्ट में संदेश साफ था – कांग्रेस को संगठन पर फोकस। लेकिन गोडसे का जिक्र विवाद को नया आयाम दे गया।
क्या आप मानते हैं कि कांग्रेस को RSS से सीखना चाहिए? कमेंट में बताएं – हम अगली पोस्ट में टॉप रिएक्शन्स शेयर करेंगे! सब्सक्राइब करें राजनीतिक किस्से के लिए। याद रखें, सियासत में तस्वीरें शब्दों से ज्यादा बोलती हैं। जय हिंद!
(डिस्क्लेमर: यह विश्लेषण तथ्यों पर आधारित है, किसी पक्ष का समर्थन नहीं। स्रोतों से सत्यापन करें।)