तेज डिलीवरी, नाजुक स्वास्थ्य(Fast deliveries, fragile health): क्या गिग वर्कर्स(gig workers) वाकई सुरक्षित हैं?

Rajeev
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तेज डिलीवरी, नाजुक स्वास्थ्य(Fast deliveries, fragile health): क्या गिग वर्कर्स(gig workers) वाकई सुरक्षित हैं?

🚀 परिचय: एक टूटा कलाई जो पूरे सिस्टम को चुनौती देती है

कल्पना कीजिए: रात के 10 बजे, बारिश की फुहारों के बीच एक डिलीवरी राइडर तेज रफ्तार से सड़क पर दौड़ रहा है। अगले ऑर्डर की जल्दी में, एक छोटी सी चूक – और उसकी कलाई टूट जाती है। दर्द तो सह लेगा, लेकिन असली सवाल यह है: क्या उसके पास इलाज के लिए पैसे हैं? क्या अस्पताल में कैशलेस ट्रीटमेंट मिलेगा? यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि भारत की गिग इकोनॉमी का आईना है।

नवंबर 2025 में केंद्र सरकार ने सोशल सिक्योरिटी कोड के प्रमुख प्रावधानों को अधिसूचित किया, जिसने गिग वर्कर्स, प्लेटफॉर्म वर्कर्स और एग्रीगेटर्स को कानूनी रूप से मान्यता दी। यह मील का पत्थर है – कागजों पर स्वास्थ्य लाभ, दुर्घटना कवरेज और मातृत्व सहायता। एग्रीगेटर्स को वार्षिक टर्नओवर का 1-2% योगदान देना होगा, जो वर्कर्स को सीधे फायदा पहुंचाएगा। लेकिन क्या यह सिर्फ कागजी कार्रवाई है, या वाकई राइडर को इमरजेंसी रूम में बिना पैसे की चिंता के इलाज मिलेगा?

इस लेख में हम गहराई से खंगालेंगे: गिग वर्कर्स स्वास्थ्य सुरक्षा कैसे काम करेगी, राज्य स्तर पर क्या हो रहा है, और सड़क पर जोखिमों का सामना कैसे किया जाए। यदि आप गिग वर्कर हैं, नीति निर्माता हैं या सिर्फ जागरूक नागरिक, तो यह पोस्ट आपके लिए है। चलिए, इसकी परतें खोलते हैं।

📜 कानूनी मील का पत्थर: सोशल सिक्योरिटी कोड 2025 क्या वादा करता है?

सोशल सिक्योरिटी कोड 2025 भारत के श्रम कानूनों का एक क्रांतिकारी कदम है। पहले गिग वर्कर्स – जैसे जोमैटो, स्विगी या उबर के डिलीवरी पार्टनर्स – 'अदृश्य' थे। अब वे कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त हैं। कोड के तहत:

  • स्वास्थ्य लाभ: दुर्घटना, बीमारी और मातृत्व के लिए कवरेज।
  • एग्रीगेटर योगदान: प्लेटफॉर्म्स को 1-2% लेवी देनी होगी, जो वेलफेयर फंड में जाएगी।
  • प्लेटफॉर्म ड्यूटीज: वर्कर्स को रजिस्ट्रेशन, ट्रेनिंग और सुरक्षा उपकरण प्रदान करना अनिवार्य।

लेकिन याद रखें, केंद्र का कोड सिर्फ ढांचा है। वास्तविक क्रियान्वयन राज्य नियमों पर निर्भर करेगा। उदाहरण के लिए, क्लेम सेटलमेंट, अस्पताल एम्पैनलमेंट और इंस्पेक्शन टीम्स – ये सब राज्य ही तय करेंगे।

क्यों महत्वपूर्ण? भारत में 310 मिलियन से ज्यादा अनौपचारिक वर्कर्स हैं, जिनमें से लाखों गिग इकोनॉमी में हैं। e-Shram पोर्टल ने 3 अगस्त 2025 तक 31 करोड़ रजिस्ट्रेशन कर लिए हैं। यह डेटाबेस स्वास्थ्य आउटरीच और इंश्योरेंस एनरोलमेंट का आधार बन सकता है। लेकिन क्या यह डेटा गोपनीयता की रक्षा करेगा? क्या क्लेम पोर्टेबल होंगे? ये सवाल अभी अनुत्तरित हैं।

स्रोत: e-Shram आधिकारिक वेबसाइट – यहां रजिस्टर करें और लाभ लें।

🏛️ राज्य स्तर पर तेजी: कर्नाटक मॉडल और अन्य पहलें

केंद्र धीमा है, लेकिन राज्य तेज। कर्नाटक प्लेटफॉर्म-बेस्ड गिग वर्कर्स (सोशल सिक्योरिटी एंड वेलफेयर) एक्ट, 2025 एक मिसाल है। इस कानून में:

  1. स्टेट वेलफेयर फंड: एग्रीगेटर्स से लेवी इकट्ठा कर फंड बनेगा।
  2. ग्रिवांस मशीनरी: वर्कर्स की शिकायतों के लिए समर्पित सिस्टम।
  3. कंप्लायंस ड्यूटीज: प्लेटफॉर्म्स को रिपोर्टिंग और ट्रेनिंग अनिवार्य।

अन्य राज्य जैसे तमिलनाडु और महाराष्ट्र भी इसी मॉडल को देख रहे हैं। महाराष्ट्र में प्रस्तावित बिल में PM-JAY (आयुष्मान भारत) से लिंकेज पर जोर है, जो गिग वर्कर्स को 5 लाख तक का कैशलेस इलाज देगा।

स्वास्थ्य के लिए क्यों मायने रखता है? गिग वर्कर्स रात-दिन काम करते हैं। क्या एम्बुलेंस नेटवर्क रात 2 बजे उपलब्ध होगा? क्या प्रोटेक्टिव गियर (हेलमेट, घुटने के गार्ड) मुफ्त मिलेगा? कर्नाटक का एक्ट इन सवालों का आंशिक जवाब देता है, लेकिन पूर्ण क्रियान्वयन बाकी है।

  • तुलना तालिका:
राज्यमुख्य प्रावधानस्वास्थ्य फोकस
कर्नाटकवेलफेयर फंड, ग्रिवांस सिस्टमदुर्घटना कवर, क्लेम सेटलमेंट
महाराष्ट्रPM-JAY लिंकेजकैशलेस इलाज, पोर्टेबिलिटी
तमिलनाडुप्रस्तावित बिलमातृत्व लाभ, स्क्रीनिंग ड्राइव्स

ये राज्य मॉडल केंद्र को प्रेरित कर सकते हैं।कर्नाटक गिग वर्कर्स एक्ट डिटेल्स

⚠️ सड़क पर जोखिम: दो-पहिया राइडर्स का दर्द

भारत की सड़कें गिग वर्कर्स के लिए युद्धक्षेत्र हैं। 2023 में 1.7 लाख सड़क हादसे हुए, जिनमें दो-पहिया यूजर्स की मौतें 10 सालों में दोगुनी हो गईं। फूड और पार्सल डिलीवरी के 'बैकबोन' राइडर्स के लिए यह रोज का खतरा है।

मुख्य जोखिम:

  • उच्च गति: टारगेट पूरा करने की दबाव में स्पीडिंग।
  • अनियमित घंटे: रात के शिफ्ट्स में कम विजिबिलिटी।
  • अपर्याप्त गियर: कई राइडर्स बिना प्रोटेक्टिव किट के काम करते हैं।

सोशल सिक्योरिटी कोड क्या कवर करता है?

  • आउटपेशेंट केयर: OPD विजिट्स के लिए रिफंड।
  • रिहैबिलिटेशन: चोट के बाद फिजियोथेरेपी।
  • लॉस्ट वेजेस: शॉर्ट-टर्म इनकम लॉस के लिए कैश।

लेकिन पहला सवाल: कौन देगा फर्स्ट-एड किट? प्लेटफॉर्म्स को अनिवार्य करना होगा। एम्पैनल्ड हॉस्पिटल नेटवर्क रात के समय उपलब्ध होने चाहिए। एक सर्वे (2024, ILO) के अनुसार, 70% गिग वर्कर्स ने कभी इंश्योरेंस क्लेम नहीं किया – जागरूकता की कमी से।

टिप्स गिग वर्कर्स के लिए:

  1. e-Shram पर रजिस्टर करें।
  2. PM-JAY कार्ड बनवाएं।
  3. प्लेटफॉर्म ऐप में इंश्योरेंस सेक्शन चेक करें।

🔍 नीति सवाल: क्या कोड स्वास्थ्य परिणामों को बदल देगा?

कोड अच्छा लगता है, लेकिन व्यावहारिक सवाल बाकी हैं। क्या यह आउटपेशेंट केयर कवर करेगा? क्या रिहैबिलिटेशन और लॉस्ट वेजेस के लिए तुरंत कैश मिलेगा? राज्य कानून जैसे कर्नाटक का जवाब देते हैं, लेकिन नट्स-एंड-बोल्ट्स – हॉस्पिटल एम्पैनलमेंट, बेनिफिट्स की पोर्टेबिलिटी, क्विक क्लेम सेटलमेंट – ही तय करेंगे कि यह कामयाब होगा या नहीं।

e-Shram का अवसर: 31 करोड़ रजिस्ट्रेशन से स्वास्थ्य ड्राइव्स संभव – वैक्सीनेशन, ऑक्यूपेशनल स्क्रीनिंग, ट्रॉमा रिस्पॉन्स मैपिंग। लेकिन रजिस्ट्रेशन पर्याप्त नहीं:

  • गोपनीयता सुरक्षा जरूरी।
  • सरल एनरोलमेंट प्रक्रिया।
  • ब्यूरोक्रेटिक फ्रिक्शन कम हो।

बिना इनके, यह 'बीमारी' ही बनी रहेगी।

🔴 मार्क्सियन नजरिया: प्लेटफॉर्म्स पर श्रम का शोषण

मार्क्स के लेंस से देखें तो प्लेटफॉर्म्स आधुनिक शोषण के केंद्र हैं। श्रम को कमोडिफाई किया जाता है, जबकि आर्थिक-स्वास्थ्य जोखिम वर्कर्स पर डाला जाता है। नया फ्रेमवर्क इस तनाव को उजागर करता है: क्या रेगुलेशन जोखिम को प्लेटफॉर्म्स और राज्य पर वापस डाल सकेगा? या जिम्मेदारी बिखरी-बिखरी रहेगी?

यह संरचनात्मक बदलाव की मांग करता है – न कि सिर्फ कागजी सुधार।

👀 नजर रखने लायक संकेत: रिपोर्टर्स और पॉलिसीमेकर्स के लिए

दो प्रैक्टिकल संकेत:

  1. मनी ट्रेल: एग्रीगेटर लेवी से फंड फ्लो को ट्रैक करें – एम्बुलेंस, कैशलेस एम्पैनलमेंट, रिहैब तक।
  2. एक्सेस ऑडिट: क्या रजिस्टर्ड वर्कर्स PM-JAY इस्तेमाल कर रहे? क्लेम कितने समय में सेटल होते?

ये जवाब बताएंगे कि कोड पेपर रिफॉर्म है या पब्लिक हेल्थ इंटरवेंशन।

🏁 निष्कर्ष: कानून से आगे, देखभाल की जरूरत

एक राइडर की टूटी कलाई सिर्फ लेबर डिस्प्यूट नहीं – यह गिग वर्कर्स स्वास्थ्य सुरक्षा की परीक्षा है। कानून मौजूद है, लेकिन क्लिनिक्स, क्लेम सिस्टम और रेगुलेटर्स आना बाकी। तभी सोशल सिक्योरिटी कोड कानूनी मान्यता से वास्तविक देखभाल तक पहुंचेगा।

गिग वर्कर्स, आवाज उठाएं। राज्य, तेजी दिखाएं। भारत की गिग इकोनॉमी मजबूत बने, लेकिन सुरक्षित भी। क्या आपके पास कोई अनुभव? कमेंट्स में शेयर करें!

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

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