विज्ञापन जगत के दिग्गज: पीयूष पांडे - एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि
23 अक्टूबर 2025 को, भारतीय विज्ञापन उद्योग ने अपना एक चमकता सितारा खो दिया। पीयूष पांडे, जिन्हें 'भारतीय विज्ञापन के पिता' कहा जाता है, 70 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हो गया। एक गंभीर संक्रमण से जूझते हुए उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनके द्वारा रचे गए विज्ञापनों की धुन, कहानियां और भावनाएं हमेशा हमारे दिलों में गूंजती रहेंगी। पीयूष पांडे न सिर्फ एक विज्ञापनकार थे, बल्कि एक कहानीकार, एक भावुक कलाकार और भारतीय संस्कृति के प्रतिबिंब थे। उन्होंने विज्ञापनों को सिर्फ उत्पाद बेचने का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि उन्हें जीवन का हिस्सा बना दिया। इस ब्लॉग में हम उनके जीवन, करियर, योगदान पर नजर डालेंगे, और उनकी विरासत को समेटने की कोशिश है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
पीयूष पांडे का जन्म 5 सितंबर 1955 को जयपुर, राजस्थान में हुआ। वे नौ भाई-बहनों वाले परिवार में बड़े हुए - सात बहनें और दो भाई। उनके भाई-बहनों में फिल्म निर्देशक प्रसून पांडे और गायिका-अभिनेत्री इला अरुण शामिल हैं। उनके पिता राजस्थान राज्य सहकारी बैंक में कार्यरत थे। पीयूष ने जयपुर के सेंट जेवियर्स स्कूल से शिक्षा प्राप्त की और दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से इतिहास में एमए किया। उनका परिवार रचनात्मक था, जिसने उनकी कल्पनाशीलता को पंख दिए। पढ़ाई के बाद वे चाय चखने वाले (टी टेस्टर) के रूप में काम किया और यहां तक कि निर्माण क्षेत्र में भी हाथ आजमाया। लेकिन उनका असली जुनून क्रिकेट और बाद में विज्ञापन में उभरा।
क्रिकेट से विज्ञापन की दुनिया तक
पीयूष पांडे एक प्रतिभाशाली क्रिकेटर थे। उन्होंने राजस्थान के लिए रणजी ट्रॉफी में खेला, लेकिन चोट के कारण उनका क्रिकेट करियर छोटा रहा। 1982 में, 27 वर्ष की उम्र में, वे ओगिल्वी एंड माथर (ओगिल्वी) में क्लाइंट सर्विसिंग एक्जीक्यूटिव के रूप में शामिल हुए। उनका पहला विज्ञापन सनलाइट डिटर्जेंट का प्रिंट ऐड था। छह साल बाद वे क्रिएटिव विभाग में चले गए, जहां उन्होंने लूना मोपेड, फेविकोल, कैडबरी और एशियन पेंट्स जैसे ब्रांडों के लिए यादगार विज्ञापन बनाए। 1994 में वे बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में नामित हुए। उनके नेतृत्व में ओगिल्वी इंडिया भारत की सबसे बड़ी विज्ञापन एजेंसी बनी और इकोनॉमिक टाइम्स के एजेंसी रेकनर सर्वे में 12 साल तक नंबर 1 रही। 2019 में वे वर्ल्डवाइड चीफ क्रिएटिव ऑफिसर और एक्जीक्यूटिव चेयरमैन इंडिया बने। जनवरी 2024 से वे चीफ एडवाइजर की भूमिका में थे। उनके 40 साल के करियर ने भारतीय विज्ञापन को पश्चिमी प्रभाव से मुक्त कर भारतीय भावनाओं से जोड़ा।
यादगार कैंपेन और जिंगल्स
पीयूष पांडे के विज्ञापनों ने ब्रांडों को अमर बना दिया। उन्होंने कहा था, "ब्रांड्स मैजिक से बनते हैं, न कि सिर्फ लॉजिक से।" उनके कैंपेन भावनाओं, हास्य और भारतीय जीवन की सच्चाई से भरे थे। कुछ प्रमुख कैंपेन:
- फेविकोल: "फेविकोल का मजबूत जोड़" टैगलाइन के साथ बस, मछली और सोफा जैसे विज्ञापन बिना शब्दों के उत्पाद की ताकत दिखाते थे। बस ऐड में झुकती बस से लोग नहीं गिरते, जो विजुअल स्टोरीटेलिंग का मास्टरपीस था। ये विज्ञापन सांस्कृतिक प्रतीक बन गए।
- कैडबरी डेयरी मिल्क: 1993 में बाजार हिस्सेदारी गिरने पर "कुछ खास है" कैंपेन बनाया। शिमोना राशि का क्रिकेट मैदान पर डांस वाला ऐड ब्रबोर्न स्टेडियम में एक टेक में शूट हुआ। यह चॉकलेट को बच्चों से वयस्कों तक ले गया और "असली स्वाद जिंदगी का" ने जश्न का प्रतीक बना दिया। इसे "कैंपेन ऑफ द सेंचुरी" कहा गया।
- एशियन पेंट्स: "हर घर कुछ कहता है" (2002) ने घरों को व्यक्तित्व दिया। वॉइसओवर में पीयूष की आवाज ने भावनाओं को छुआ, जो कंपनी की बिजनेस फिलॉसफी बनी। 2024 में यह वापस लौटा।
- वोडाफोन (हच): "यू एंड आई" में चीका नामक पग कुत्ता लड़के का पीछा करता है, "व्हेयरएवर यू गो, अवर नेटवर्क फॉलोज"। यह पग मेनिया बना। 2009 में जूजू कैंपेन IPL के लिए, जहां अंडे जैसे जीव गिबरिश बोलते हैं, मर्चेंडाइज तक पहुंचा।
- पोलियो अभियान: "दो बूंद जिंदगी की" में अमिताभ बच्चन की आवाज "धिक्कार है हम पर" ने माताओं को वैक्सीनेशन के लिए प्रेरित किया। भारत 2014 में पोलियो मुक्त हुआ।
- मिले सुर मेरा तुम्हारा: 1988 का राष्ट्रीय एकीकरण गीत, जो 14 भाषाओं में था, स्वतंत्रता दिवस पर प्रसारित हुआ और राष्ट्रगान जैसा बना।
- अन्य: "चल मेरी लूना", "अबकी बार मोदी सरकार" (2014 चुनाव), गुजरात टूरिज्म, गूगल रीयूनियन आदि।
इन कैंपेन ने ब्रांडों को संस्कृति का हिस्सा बनाया, बाजार हिस्सेदारी बढ़ाई और सामाजिक बदलाव लाए।
पुरस्कार और सम्मान
पीयूष को असंख्य पुरस्कार मिले। वे इकोनॉमिक टाइम्स द्वारा आठ साल सबसे प्रभावशाली विज्ञापनकार चुने गए। कैंस लायंस में पहला एशियाई जूरी प्रेसिडेंट (2004), लायन ऑफ सेंट मार्क (2018, भाई प्रसून के साथ), क्लियो लाइफटाइम अचीवमेंट (2012), पैड्मा श्री (2016) और LIA लीजेंड अवॉर्ड (2024)। ओगिल्वी ने उनके नेतृत्व में 25 कैंस लायंस जीते।
भारतीय विज्ञापन पर प्रभाव
पीयूष ने विज्ञापन को अंग्रेजी से हिंदी और स्थानीय भाषाओं में लाया, भावनाओं को प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा, "आइडियाज सड़क से आते हैं, जीवन से।" उन्होंने पीढ़ियों को मेंटर किया, ओगिल्वी को वैश्विक स्तर पर रचनात्मक बनाया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उन्हें "टाइटन ऑफ इंडियन एडवरटाइजिंग" कहा, जबकि आनंद महिंद्रा ने उनकी हंसी और जिंदगी के जज्बे को याद किया। हंसल मेहता ने कहा, "फेविकोल का जोड़ टूट गया।"
पीयूष पांडे की विरासत अमर है। उन्होंने साबित किया कि विज्ञापन दिल से बनते हैं, जो लोगों को जोड़ते हैं। उनकी किताबें जैसे "Pandeymonium" (2015) और "ओपन हाउस" (2022) उनकी सोच को जीवित रखेंगी। वे चले गए, लेकिन उनके विज्ञापन हमारी स्मृतियों में बसे रहेंगे। श्रद्धांजलि।