केरल में आश्चर्यजनक विकास: आधार कार्डों की संख्या राज्य की आबादी से अधिक!
केरल, जो हमेशा से ही भारत के विकास के नक्शे पर एक चमकदार उदाहरण रहा है—उच्च साक्षरता दर, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और सामाजिक न्याय की मिसाल। लेकिन अब यह राज्य एक ऐसी खबर के केंद्र में है जो न केवल आश्चर्यजनक है, बल्कि चिंताजनक भी। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक राज्य की जनसंख्या से ज्यादा आधार कार्ड जारी हो जाएं? जी हां, यही सच्चाई है। यूनीक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (UIDAI) द्वारा एक आरटीआई (राइट टू इंफॉर्मेशन) क्वेरी के जवाब में खुलासा हुआ है कि 30 सितंबर 2025 तक केरल की आबादी 3,60,63,000 है, जबकि आधार कार्डों की संख्या 4,09,68,282 तक पहुंच चुकी है। यानी लगभग 49 लाख का फर्क! यह आंकड़ा न केवल आश्चर्य पैदा करता है, बल्कि सवालों की बौछार भी लगाता है—क्या यह डुप्लिकेट एंट्रीज का मामला है? प्रवासियों का प्रभाव? या फिर सिस्टम में कोई खामी?
इस खबर ने सोशल मीडिया से लेकर न्यूज चैनलों तक हलचल मचा दी है। केरल, जो अपनी कुशल प्रशासनिक व्यवस्था के लिए जाना जाता है, अब इस विसंगति के कारण चर्चा का विषय बन गया है। लेकिन यह पहली बार नहीं है जब ऐसी असंगतियां सामने आई हैं। अन्य राज्यों में भी आधार कार्डों की संख्या आबादी से अधिक होने के मामले दर्ज किए गए हैं, लेकिन केरल का यह आंकड़ा सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है। आइए, इस मुद्दे को गहराई से समझते हैं।
आधार प्रणाली: एक क्रांतिकारी कदम या सिरदर्द?
आधार कार्ड, जो 2009 में शुरू हुआ था, भारत की सबसे बड़ी बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली है। इसका उद्देश्य हर नागरिक को एक अद्वितीय 12-अंकीय नंबर देना था, ताकि सरकारी योजनाओं, बैंकिंग और सब्सिडी वितरण में पारदर्शिता आए। आज तक, पूरे देश में 130 करोड़ से अधिक आधार कार्ड जारी हो चुके हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब संख्या आबादी से ज्यादा हो जाती है। UIDAI के अनुसार, केरल में यह वृद्धि 13.6% से अधिक है। सरल शब्दों में, हर 100 लोगों के लिए 113 आधार कार्ड!
इसका एक कारण प्रवास हो सकता है। केरल से लाखों लोग खाड़ी देशों और अन्य राज्यों में काम के लिए जाते हैं। कई बार, वे वहां नया आधार कार्ड बनवा लेते हैं या पुराना डुप्लिकेट हो जाता है। लेकिन क्या इतनी बड़ी संख्या केवल प्रवास से समझी जा सकती है? विशेषज्ञों का कहना है कि नहीं। आरटीआई कार्यकर्ता और डेटा एनालिस्ट्स का मानना है कि 'घोस्ट एंट्रीज'—यानी काल्पनिक या मृत व्यक्तियों के नाम पर बने कार्ड—इसमें भूमिका निभा रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, केरल में जन्म और मृत्यु पंजीकरण में देरी के कारण कई मृतकों के आधार सक्रिय रहते हैं। इसके अलावा, आधार नामांकन केंद्रों पर सत्यापन की कमी ने डुप्लिकेट्स को बढ़ावा दिया है।
अन्य राज्यों की तुलना: केरल अकेला नहीं, लेकिन सबसे आगे
यह समस्या केरल तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी आधार कार्डों की संख्या आबादी से 5-10% अधिक है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश की आबादी लगभग 24 करोड़ है, लेकिन आधार 26 करोड़ से ज्यादा। लेकिन केरल का मामला अलग है क्योंकि यहां साक्षरता दर 96% से ऊपर है और डिजिटल साक्षरता भी उच्च स्तर की है। ऐसे में, यह विसंगति और भी गंभीर लगती है। एक अध्ययन से पता चलता है कि दक्षिण भारत के राज्यों में यह समस्या ज्यादा है, शायद इसलिए क्योंकि यहां आधार लिंकिंग अनिवार्य है—जैसे PDS (पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम) और पेंशन योजनाओं के लिए।
सरकार की ओर से क्या कहा जा रहा है? UIDAI ने स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड जारी करना स्वैच्छिक है, और इसमें गैर-निवासियों (जैसे पर्यटक या अस्थायी निवासी) को भी शामिल किया जाता है। लेकिन आलोचक इसे बहाना मानते हैं। विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां, ने इस मुद्दे को उठाया है। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा है कि राज्य सरकार इसकी जांच कराएगी और डुप्लिकेट्स को हटाने के लिए ड्राइव चलाएगी। लेकिन सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर सफाई कैसे होगी? क्या यह गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करेगा?
निहितार्थ: गोपनीयता, धोखाधड़ी और डिजिटल भारत का भविष्य
यह विसंगति केवल आंकड़ों की बात नहीं है; इसके गंभीर परिणाम हैं। सबसे पहले, धोखाधड़ी का खतरा। आधार का उपयोग वोटर आईडी, पासपोर्ट और बैंक खातों से लिंक करने के लिए होता है। अगर डुप्लिकेट कार्ड हैं, तो फर्जी पहचान बनाना आसान हो जाता है। दूसरा, गोपनीयता का मुद्दा। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में आधार को संवैधानिक माना था, लेकिन शर्त रखी थी कि इसका दुरुपयोग न हो। अब, 49 लाख अतिरिक्त कार्डों से डेटा लीक का डर बढ़ गया है। तीसरा, डिजिटल इंडिया अभियान पर सवाल। अगर आधार जैसी बुनियादी प्रणाली में खामियां हैं, तो अन्य डिजिटल पहलें कैसे विश्वसनीय रहेंगी?
केरल के संदर्भ में, यह और भी संवेदनशील है। राज्य में सामाजिक कल्याण योजनाएं आधार पर निर्भर हैं। अगर कार्डों में विसंगति है, तो लाखों गरीब परिवारों को सब्सिडी न मिलने का खतरा है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि आधार को जनसंख्या रजिस्टर (NPR) से जोड़कर सत्यापन मजबूत किया जाए। साथ ही, AI-आधारित डुप्लिकेट डिटेक्शन सिस्टम अपनाए जाएं। लेकिन इसके लिए संसाधनों और इच्छाशक्ति की जरूरत है।
निष्कर्ष: सुधार का समय आ गया है
केरल का यह 'सर्वाधिक आधार वाला राज्य' बनना एक विडंबना है। यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि डिजिटल गवर्नेंस की कमजोरियों को भी। लेकिन अच्छी बात यह है कि राज्य की सक्रिय नागरिकता और मीडिया की भूमिका से जल्द सुधार संभव है। UIDAI को तत्काल डी-डुप्लिकेशन अभियान चलाना चाहिए, और सरकार को पारदर्शी रिपोर्टिंग सुनिश्चित करनी चाहिए। आखिरकार, आधार का मकसद जनता की सुविधा है, न कि भ्रम का।
केरल ने हमेशा भारत को नई दिशा दिखाई है—शिक्षा, स्वास्थ्य और अब डिजिटल सुधार में भी। आशा है कि यह विसंगति एक सबक बनेगी, और हम एक मजबूत, विश्वसनीय आधार प्रणाली की ओर बढ़ेंगे। आप क्या सोचते हैं? कमेंट्स में अपनी राय साझा करें!
(यह लेख उपलब्ध आंकड़ों और विश्लेषण पर आधारित है। अधिक जानकारी के लिए UIDAI की आधिकारिक वेबसाइट देखें।)