लालू परिवार की सियासी खींचतान; भाई बनाम भाई जब तेज प्रताप और तेजस्वी आमने-सामने आए तो क्या हुआ?
राजनीति में परिवारवाद का चेहरा हमेशा से ही विवादास्पद रहा है। जहां एक ओर यह एकजुटता का प्रतीक बनता है, वहीं दूसरी ओर आंतरिक कलह की आग को हवा देता है। बिहार की सियासत में लालू प्रसाद यादव का परिवार इसका जीता-जागता उदाहरण है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के संस्थापक लालू जी के दो बेटे – तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव – जो कभी एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर चुनावी रैलियों में नारे लगाते थे, आज भाई बनाम भाई की जंग में आमने-सामने हैं। हाल ही में एक ऐसी घटना घटी, जो इस पारिवारिक दरार को नंगा कर देती है। पटना के एक व्यस्त बाजार में दोनों भाइयों की मुलाकात हुई, लेकिन वह मुलाकात 'मुलाकात' कम, 'प्रतीकात्मक दूरी' ज्यादा साबित हुई। उनके साथ वीआईपी नेता मुकेश सहनी भी थे। दोनों के बीच कुछ मीटर की दूरी थी, लेकिन किसी ने एक-दूसरे की ओर नजर तक नहीं उठाई। यह दृश्य न केवल राजनीतिक जानकारों के लिए चौंकाने वाला था, बल्कि आम जनता के लिए भी लालू परिवार की आंतरिक कलह का आईना बन गया।
आइए, इस घटना को विस्तार से समझते हैं। कल्पना कीजिए: पटना का वह हलचल भरा बाजार, जहां खरीदारी की भीड़ में नेता भी घूमते हैं। तेजप्रताप यादव, जो महुआ विधानसभा क्षेत्र से अपनी राजनीतिक जड़ें मजबूत करने में जुटे हैं, अपने कुछ साथियों के साथ वहां पहुंचे। कुछ ही दूरी पर तेजस्वी यादव, महागठबंधन के चेहरे के रूप में राज्यव्यापी प्रचार अभियान चला रहे युवा नेता, अपनी टीम के साथ खड़े थे। बीच में मुकेश सहनी, जो आरजेडी के सहयोगी दल वीआईपी के प्रमुख हैं, भी खड़े थे। तेजस्वी ने सवाल जरूर पूछा – तेजप्रताप के साथ खड़े एक मीडिया कर्मी को इशारा करते हुए। "क्या भईया शॉपिंग करा रहे हैं?" यह सवाल हल्का-फुल्का लग सकता है, लेकिन इसमें छिपी तल्खी किसी से छिपी नहीं। तेजप्रताप की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। न मुस्कान, न अभिवादन, न ही कोई बातचीत। बस, एक ठंडी चुप्पी, जो सियासी हवा को और गरम कर गई।
यह घटना नई नहीं है। तेजप्रताप और तेजस्वी के बीच खींचतान महुआ विधानसभा सीट से तेजप्रताप के खिलाफ तेजस्वी के प्रचार में उतरने के बाद से ही खुलकर सामने आ चुकी है। याद कीजिए, 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान तेजप्रताप ने महुआ से टिकट मांगा था। लेकिन पार्टी हाईकमान ने तेजस्वी को वहां उतार दिया। तेजप्रताप को लगा कि उनका अपना भाई ही उनकी राह में बाधा बन रहा है। तब से यह 'भाई बनाम भाई' की राजनीति लोगों की जुबान पर चढ़ गई। तेजप्रताप ने खुलेआम कहा था कि परिवार में सत्ता का लोभ हावी हो रहा है। वहीं, तेजस्वी ने इसे 'पार्टी की रणनीति' बताकर टाल दिया। लेकिन अब, चुनावी मौसम में यह तल्खी एक नया रूप ले चुकी है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मुलाकात संयोग नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक दूरी का प्रतीक है। आरजेडी खेमे के नेता भले ही इसे 'बस एक संयोग' बताकर टालने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। लालू परिवार, जो कभी बिहार की पिछड़ी और दलित राजनीति का प्रतीक था, आज अपनी आंतरिक कलह से जूझ रहा है। तेजस्वी यादव, 35 वर्षीय युवा नेता, को पार्टी ने महागठबंधन का चेहरा बनाया है। वे राज्यभर में रैलियां कर रहे हैं, युवाओं को जोड़ रहे हैं और नीतीश कुमार सरकार पर हमलावर हैं। उनकी छवि एक आक्रामक, आधुनिक नेता की है – सोशल मीडिया पर सक्रिय, क्रिकेटर से राजनेता बने। वहीं, तेजप्रताप यादव, बड़े भाई, अपनी अलग राह चले हैं। वे अपनी सीमित लेकिन वफादार जनाधार के साथ मैदान में हैं। महुआ जैसे ग्रामीण इलाकों में उनकी पकड़ मजबूत है, जहां वे लालू जी के पुराने सिद्धांतों – जमीनी मुद्दों और सामाजिक न्याय – को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन उनकी छवि विवादों से घिरी रहती है – शादी-ब्याह के बाद की घटनाओं से लेकर राजनीतिक फैसलों तक।
चुनावी मौसम में दोनों भाइयों का इस तरह आमने-सामने होकर भी मौन रहना इस बात का संकेत है कि लालू परिवार में राजनीतिक दरार अब केवल अफवाह नहीं रह गई। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के आखिरी दौर में तेजस्वी यादव प्रचार की कमान संभाले हैं। वे महागठबंधन को मजबूत करने के लिए कांग्रेस, वाम दलों और अन्य सहयोगियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। उनकी रैलियां युवाओं से खचाचख भरी हैं, जहां वे बेरोजगारी, पलायन और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर जोर दे रहे हैं। दूसरी ओर, तेजप्रताप यादव अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने में लगे हैं। वे आरजेडी के कोर वोट बैंक – यादव और मुस्लिम समुदाय – को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह दोहरी रणनीति पार्टी के लिए दोधारी तलवार साबित हो रही है। एक ओर तेजस्वी की युवा अपील, दूसरी ओर तेजप्रताप की जमीनी पकड़ – लेकिन दोनों के बीच तालमेल की कमी साफ दिख रही है।
इस पारिवारिक कलह के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा है सत्ता का लोभ। लालू जी की उम्र और स्वास्थ्य समस्याओं के कारण परिवार में उत्तराधिकार का सवाल गर्म है। तेजस्वी को 'क्राउन प्रिंस' माना जा रहा है, जबकि तेजप्रताप खुद को 'ओरिजिनल वारिस' साबित करने को बेताब हैं। इसके अलावा, व्यक्तिगत मतभेद भी हैं। तेजप्रताप का मानना है कि तेजस्वी की महत्वाकांक्षा ने परिवार को बांट दिया है। वहीं, तेजस्वी के करीबियों का कहना है कि तेजप्रताप की 'अनप्रेडिक्टेबल' छवि पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है। मुकेश सहनी जैसे सहयोगी नेता इस बीच फंस गए हैं। वे दोनों पक्षों के बीच बैलेंस बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस घटना ने उनकी परेशानी बढ़ा दी।
यह सियासी खटास अब केवल लालू परिवार तक सीमित नहीं। बिहार की जनता इसे भाई बनाम भाई की राजनीति के रूप में देख रही है। विपक्षी दल – भाजपा और जदयू – इसे भुनाने का मौका तलाश रहे हैं। नीतीश कुमार ने तो यहां तक कहा है कि 'परिवारवाद बिहार का दुश्मन है।' लेकिन सवाल यह है कि क्या यह दरार आरजेडी को चुनावी नुकसान पहुंचाएगी? जानकारों का अनुमान है कि हां, क्योंकि वोटर अब परिवार की एकजुटता देखना चाहते हैं। अगर तेजस्वी और तेजप्रताप का यह मौन युद्ध जारी रहा, तो महागठबंधन की एकता पर सवाल उठेंगे।
अंत में, यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है। राजनीति में परिवारवाद एक अभिशाप है या वरदान? लालू परिवार के लिए तो यह फिलहाल अभिशाप ही साबित हो रहा है। उम्मीद है कि भाइयों के बीच यह दूरी जल्द पाट दी जाए, ताकि बिहार की सियासत में सामाजिक न्याय की आवाज मजबूत हो। वरना, यह नया अध्याय परिवार को ही निगल जाएगा।